Sunday, November 1, 2009

मैं नज़्म निभा रहा हूँ,

मैं नज़्म निभा रहा हूँ,

तुम्हारी तस्वीर भी साथ में हैं,
मेरी कलम,
ये बेरंग,अकेले पन्ने,
और मैं भी यहीं हूँ,
पर तुम नहीं हो.
पता हैं ,
जब हम साथ होते थे,
तुम बहुत सी बाते किया करती थी,
मैं चुपचाप उन्हें सुनता था,
और उन्हें बाद में,
अपने नाम लिख देता था,
तुम्हे पता भी नहीं चलता था,
जब तुम्हारा हाथ मेरे हाथो में होता
और मैं तुम्हे देखता रहता,
तुम ठीक से शरमा भी नहीं पाती थी,
की तुम्हारी शर्म,
मेरी नज्म हो जाती थी,
खैर!
अब तो तुम बात ही नहीं करती,
न जाने क्यूँ चुप सी रहती हो,
पर मैं बोलता रहता हूँ,
मेरे हाथ उसी तरह बढ़ते हैं,
मैं तुम्हे आज भी देखता रहता हूँ
पर तुम शर्माती नहीं हो,
और मेरा हाथ वापस लौट आता हैं,
नज़्म आज भी लिखता हैं,
बस इतना फर्क होता हैं,
पहले तुम्हारी बाते लिखता था,
और अब खामोशी ,
अब मेरे भी अल्फाज नहीं,
खामोशिया लिखती हैं,
आंसू हंसने लगते हैं,
और नज़्म पूरी हो जाती हैं


AmAn DaLaL











2 comments:

  1. bahut umda najm . bahut sundar bahv. ek sudhar ki avasyakata ( aisa mujhe lagta hai baki yeh apki rachna hai } :NAJM AAJ BHI LIKHTA HOON)
    BEJOD

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  2. की तुम्हारी शर्म,
    मेरी नज्म हो जाती थी,

    बहुत खूब ....!!

    पहले तुम्हारी बाते लिखता था,
    और अब खामोशी ,
    अब मेरे भी अल्फाज नहीं,
    खामोशिया लिखती हैं,
    आंसू हंसने लगते हैं,
    और नज़्म पूरी हो जाती हैं

    इन पंक्तियों में कुछ सुधार की जरुरत लगी अगरचे भावों में गहराई है ...........!!

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